जैसा खाए अन्न, वैसे होए मन

जैसा खाए अन्न, वैसे होए मन

एक कहावत है कि जैसा खाए अन्न, वैसे होए मन। निष्कर्ष मनगढ़ंत तो है नहीं, लेकिन कोई प्रमाण भी नहीं है। कहानियों या उदाहरणों के माध्यम से इसे जरूर समझा जा सकता है। एक राजऋषि, अतिथि के तौर पर एक राजा के यहां पहुंचे। राजा ने उनका खूब आदर- सत्कार किया, भोजन कराया। भोजन करने के कुछ घंटों बाद ही ऋषि की मनोवृत्ति में अंतर आ गया और वह राजा का हार चुरा बैठे। अब राजा धर्मसंकट में पड़ गया कि ऋषि पर दोष कैसे लगाए ? काफी सोच-विचार के बाद, विद्वानों ने राय दी, ‘‘अन्न का प्रभाव मन पर पड़ता है। कहीं राजकोष का यह अन्न ही दोषपूर्ण न हो, अतः इसकी जांच कराई जाए।’’ राजा ने अन्न की जांच कराई, तो पाया कि जिस अन्न से ऋषि का भोजन बनाया गया था, वह एक चोर से बरामद किया गया था।
तब राजा की समझ में आया कि ऋषि का व्यवहार ऐसा क्यों हो गया था। तमाम तरह के शोध में यह बात सामने आई है कि हमारे खानपान में यदि लौह तत्त्व की कमी हो, तो हमारा स्वभाव चिड़चिड़ा और क्रोधी हो जाता है। भोजन में लौह तत्त्व की उचित पूर्ति होते ही, हम पुनः शांत और हंसमुख हो जाते हैं। ज्यादा मिर्च-मसाले और तीखे स्वाद वाले पदार्थ खाने वालों के मन में धैर्य का अभाव पाया जाता है। गरिष्ठ भोजन करने वाले आलसी और निकम्मे हो जाते हैं। भोजन में कुछ विटामिन्स की कमी होने के कारण भी शरीर के साथ हमारा मन भी प्रभावित होता है। हमारा निष्कर्ष तो मात्र इतना ही है कि हमारे भोजन में उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सभी तत्त्वों का संतुलन और समावेश हो। तभी आहार ‘संतुलित आहार’ कहलाता है। सबसे बड़ी कठिनाई तो यह है कि सामर्थ्य होते हुए भी हम संतुलित आहार की अनदेखी कर देते हैं। दूसरी ओर गरीबी या मजबूरी भी हमें संतुलित आहार से वंचित रखती है। संतुलित आहार की जानकारी न होना, शिक्षा की कमी होने के कारण भी ऐसा होता है। दूसरी कठिनाई यह है कि सदैव नाप-तौलकर, तत्त्वों की मात्रा का परीक्षण कर हम अपने भोजन का निर्धारण नहीं कर पाते। इसका विकल्प है कि ऐसा भोजन न लें, जो हमारी मानसिक चेतना और शारीरिक क्षमताओं को नष्ट करे। हमारा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, हमारा आचरण जिससे संतुलित रहे, वैसा ही हम खाएं। 
 

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